Wednesday, June 18, 2008

खामोशी

यादों की खामोशी में शब्द भी जम गये ।
बयार आये तो शायद कुछ पिघल जावें ।।

उडान

पतंग सा ज्वाला के इर्द गिर्द क्यों अपने को भस्म करुँ ।
नहीं किसी के हाथों से झटके खा खाकर उडा करुँ ॥
बस चकोर सा व्रत लेकर उडूँ चाँद का चुम्बन कर लूँ ।
लोटूँ तो कंचन शिखरों पर चन्द्र किरण मैं बिखरा दूँ ॥
फिर वासंतिक वसुंधरा में अनायास घुलमिल जाऊँ ।
बिंब चाँद का पोखर में मनहर निहार विश्राम करूँ ॥

Tuesday, June 17, 2008

बनें अग्रणी

हम हैं दिव्य शक्ति के स्वामी बनें अग्रणी नहिं अनुगामी ।
अपने ही अनुभव के बल पर नये सृजन आधार बनायें ॥